मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों में दार्शनिक चेतना: एक समीक्षात्मक अध्ययन
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ग़ालिब, ग़ज़ल, दार्शनिक चेतना, उर्दू साहित्य, अस्तित्ववाद, सूफ़ी दर्शन##article.abstract##
मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी साहित्य के उन महान स्तंभों में से एक हैं जिनकी रचनाओं में दर्शन, प्रेम, पीड़ा और जीवन की जटिलताओं का अद्भुत संगम मिलता है। प्रस्तुत शोधपत्र ग़ालिब की ग़ज़लों में निहित दार्शनिक चेतना का समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन में यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि ग़ालिब केवल एक प्रेम कवि नहीं थे, बल्कि वे एक गहन दार्शनिक भी थे जिन्होंने जीवन, मृत्यु, ईश्वर, प्रेम और मानवीय अस्तित्व जैसे मूलभूत प्रश्नों से अपनी ग़ज़लों के माध्यम से जूझने का साहस किया। शोध में ग़ालिब के चुने हुए अशआर का विस्तृत विश्लेषण किया गया है तथा उनकी दार्शनिक दृष्टि को पश्चिमी और भारतीय दर्शन की परंपराओं के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया गया है।